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देश के अग्रणी गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश की शीर्ष प्रतिष्ठित संस्था, उ0प्र0 गन्ना शोध परिषद्, शाहजहाँपुर के निदेशक के पद का दायित्व मैंने दिनाॅंक 27 अक्टूबर 2014 को ग्रहण किया है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश की गन्ना उत्पादकता लगभग 62 टन प्रति हेक्टेयर एवं चीनी परता 9.2 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय उत्पादकता एवं चीनी परता क्रमशः 69 टन प्रति हेक्टेयर एवं 10.03 प्रतिशत से कम है।

देश के कुल गन्ना क्षेत्रफल के आधे से अधिक भू-भाग वाले तथा गन्ने के व्यवहारिक खेती पर एक शताब्दी से अधिक के अनुभव से युक्त उत्तर प्रदेश में औसत गन्ना उपज व चीनी परता अन्य प्रान्तों की तुलना में कम होने के साथ ही राष्ट्रीय औसत से भी कम है जो चिन्ता का विषय है। हमारा प्रयास उत्पादकता एवं चीनी परता दोनों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुॅचाने का होगा।
 

गन्ना एवं चीनी उत्पादन में गन्ना प्रजातियों का विशेष योगदान है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में शीघ्र पकने वाली को0 0238, को0 0118, को0शा0 08272, को0शा0 96268, को0शा0 8436, यू0पी0 05125, को0से0 98231, को0से0 03234 तथा मध्य देर से पकने वाली को0 05011, को0शा0 08279 एवं को0से0 01434 सहित कई अन्य उन्नतशील प्रजातियाॅं बुवाई प्रचलन में हैं। माह नवम्बर 2014 में मध्य-देर से पकने वाली दो नयी प्रजातियाॅ को0शा0 08276 (सम्पूर्ण उ0प्र0 में) एवं को0से0 08452 (पूर्वी उ0प्र0 में) बुवाई हेतु अवमुक्त की गयी हैं। निकट भविष्य में नवीन, क्षमतावान एवं उत्कृष्ट प्रजातियों के विकास का यह सिलसिला और तेजी से आगे बढ़ाया जायेगा।

प्रदेश में गन्ना जातीय संतुलन की स्थिति संतोषजनक नहीं है। लगभग 15 प्रतिशत क्षेत्रफल अनुपयुक्त-पुरानी-बहिष्कृत-रोगी प्रजातियों से आच्छादित है। इन प्रजातियों को शीघ्र्र पकने वाली नई क्षमतावान प्रजातियों से विस्थापित करने हेतु किसानों को पर्याप्त बीज उपलब्ध कराना मेरी प्रार्थमिकता होगी तथा यह प्रयास किया जायेगा कि किसानों की पसन्द और क्षेत्रीय अनुकूलता के आधार पर नई प्रजातियों का बीज गन्ना उत्पादन करके कृषकों कोे उनके क्षेत्र में ही उपलब्ध कराया जा सके। परिषद द्वारा प्रति वर्ष उत्पादित नवीन प्रजातियों के लगभग 2.0 लाख कुन्तल अभिजनक बीज गन्ना का सदुपयोग सुनिष्चित करते हुये अधिकाधिक क्षेत्रफल आच्छादित कराने का प्रयास किया जायेगा। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों का क्षेत्रफल औसतन 15 प्रतिशत है जिसे बढ़ाकर 40 प्रतिशत तक करना होगा।

शरद्काल में गन्ना बोने का प्रचलन काफी कम है जबकि गेहूॅं काटकर देर से (अप्रैल-मई में) गन्ना बोने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है जो किसानों, मिलों और प्रदेश की गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है। अतः मध्यम एवं छोटे कृषकों को गेहूॅं और गन्ने की खेती एक साथ करने के लिये नई तकनीक ’’एफ0आई0आर0बी0’’ अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जायेगा। पूर्व निदेशक डा0 बक्शीराम द्वारा चलाये जा रहे बीज बदलाव कार्यक्रम एवं अन्य सुझावों के अनुरूप शोध कार्य को आगे बढ़ाया जायेगा तथा प्रयोगशाला विष्लेषण सम्बन्धी कार्यों में और अधिक उत्कृष्टता लाने का प्रयास किया जायेगा।

उत्तर प्रदेश में अत्यधिक जलवायु विविधता, अपर्याप्त कृषि संसाधन तथा पेड़ी प्रबन्धन पर ध्यान न देना जैसे अन्य कारण भी हैं जो प्रदेश में गन्ना एवं चीनी उत्पादन को कुप्रभावित करते हैं। अतः आधुनिक संचार माध्यमों द्वारा उपरोक्त समस्याओं का निदान करने तथा शोध से प्राप्त उपलब्धियों को कम से कम समय में किसानों तक पहुॅंचाने हेतु प्रभावी प्रचार-प्रसार किया जायेगा। उपज वृद्धि हेतु गन्ने में लगने वाले रोगों व कीटों के प्रभावी नियंत्रण हेतु शोध कार्य तथा रोग-कीट प्रबन्धन पर विशेष ध्यान दिया जायेगा। गन्ना कृषकों की समस्याओं के त्वरित समाधान हेतु निकटवर्ती शोध संस्थान के वैज्ञानिकों को उनके प्रक्षेत्रों तक भेजा जायेगा।

उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुये आवश्यकतामूलक तथा परिणामी शोध कार्यों को बढ़ावा देना मेरी प्राथमिकताओं में शामिल है। मेरा विश्वास है कि चीनी मिलों, किसानों तथा वैज्ञानिकों के समन्वित प्रयास से प्रदेश के गन्ना एवं चीनी उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी।


बी0एल0 शर्मा
प्रभारी निदेशक
उ० प्र० गन्ना शोध परिषद