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उत्तर प्रदेश के 42 लाख गन्ना कृषकों के हितों हेतु सतत प्रयत्नशील देश की इस शीर्श संस्था ’’उ.प्र. गन्ना शोध परिषद’’ के निदेशक के रूप में मेरे द्वारा दिनाँक 17 अप्रैल 2018 को कार्यभार ग्रहण किया गया। लगभग 23 लाख हेक्टेयर गन्ना क्षेत्रफल से आच्छादित उत्तर प्रदेश की औसत उपज 79 टन व 10.85 प्रतिशत से अधिक चीनी परता के साथ हम चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र को पीछे छोड़ते हुए प्रथम पायदान पर आ गये हैं। यह सन्तोष की बात है, परन्तु हमें 2022 तक कृषकों की आय दोगुनी करने हेतु गन्ना खेती के कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता होगी।

जिसमें बदलती जलवायु के अनुरूप अधिक उपज एवं चीनी परता देने वाली गन्ना किस्मों का विकास करना, कृषकों को मृदा स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करना होगा। किसानों को आवश्यकता के अनुसार ही संतुलित उवर्रकों एवं कीटनाशकों का उपयोग करने, गन्ना उत्पादन के साथ-साथ अन्तःफसली खेती अपनाने के लिए भी प्रेरित करना होगा। उत्पाद विविधता के लिए गुड़ उत्पादन के साथ ही गन्ने एवं गन्ने के रस से अन्य उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण देना होगा जिससे मूल्य सम्वर्द्धन के फलस्वरूप कृषकों को अधिक लाभ प्राप्त हो सके। इसके लिए गन्ना किसान, वैज्ञानिक एवं गन्ना विकास विभाग के समन्वित प्रयास की आवश्यकता है।
 

शोध संस्थान द्वारा विकसित उन्नतिशील गन्ना प्रजातियों तथा उत्पादन की उन्नत विधियों द्वारा हम 100 टन से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु आवश्यकता है तकनीकी को सही रूप में अपनाकर खेती में प्रयोग करें। नवीन प्रजातियों के विकास हेतु हम निरन्तर प्रयत्नशील हैं तथा प्रदेश के गन्ना कृषकों को उच्च गुणवत्तायुक्त, रोगरोधी, प्रजातियों के अभिजनक बीज गन्ना की उपलब्धता हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में सम्मिलित है। खेती की लागत कम करने तथा प्रति इकाई अधिक उत्पादन हेतु हमें पेड़ी प्रबन्धन के साथ ही साथ अन्तः फसली खेती पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, जिस हेतु संस्थान द्वारा वृहद रूप में तकनीकी हस्तान्तरण हेतु विभिन्न प्रसार माध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है।

कृषकों एवं चीनी मिलों के आर्थिक हितों हेतु प्रजातीय संतुलन बहुत आवश्यक है। शरदकालीन बावग के अन्तर्गत क्षेत्रफल बढ़ाकर अन्तःफसली खेती को बढ़ाने तथा गेहॅू कटाई के बाद गन्ना बुवाई की प्रथा को कम करके एफ.आई.आर.बी. पद्धति को अपनाने की आवश्यकता है।

मृदा उवर्रता एवं उत्पादकता को लम्बे समय तक बनाये रखने हेतु कार्बनिक पदार्थो की समुचित आपूर्ति के साथ-साथ संतुलित रूप में उवर्रकों का प्रयोग, बुवाई से पूर्व बीजोपचार, गन्ना बुवाई हेतु टेªन्च विधि का प्रयोग, सिचाई के लिए टपक सिचाई का प्रयोग एवं कीट एवं रोगों के नियन्त्रण हेतु समन्वित कीट एवं रोग प्रबन्धन आदि पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।


डा. ज्योत्स्नेन्द्र सिंह
निदेशक
उ० प्र० गन्ना शोध परिषद