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रस शोधन का महत्व
गन्ने के रस में अनेक प्रकार की अशुद्धियॉं मिली रहती हैं जिन्हें रस से अलग करना बहुत आवश्यक होता है। इसकी सफाई किये बिना उत्तम क्वालिटी का गुड़ नहीं बनाया जा सकता। गुड़ बनाने हेतु रस की सफाई में मुख्यत: दो प्रकार के रस शोधक प्रयोग किये जाते हैं।
वानस्पतिक रस शोधक
उत्तम क्वालिटी का गुड़ बनाने हेतु गन्ने के रस की सफाई वानस्पतिक रस शोधकों से ही करनी चाहिये जैसे देवला (150 ग्राम) या भिण्डी का पौधा (200 ग्राम) या सेमल/फालसा की छाल (250 ग्राम)। इनमें से किसी एक की निर्दिष्ट मात्रा को कूटकर, मसलकर 05 लीटर पानी में घोल बना लेना चाहिये। यह घोल 04 कुन्टल रस की सफाई हेतु पर्याप्त होता है।
रासायनिक रस शोधक
जहॉं तक सम्भव हो रासायनिक रस शोधकों के प्रयोग से बचना चाहिये क्योंकि इनका प्रयोग स्वास्थ्य के लिये हानिकारक तो होता ही है, इसका प्रयोग कर बनाये गये गुड़ की भण्डारण क्षमता भी घट जाती है। केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में ही इनका संतुलित मात्रा में प्रयोग करना चाहिये। रासायनिक रस शोधकों में प्रमुख हैं–सोडियम हाइड्रोसल्फाइट (40–50 ग्राम), सोडियम बाई–कार्बोनेट (10–15 ग्राम), चूने का पानी आधा लीटर। यह मात्रा 04 कुन्टल रस की सफाई हेतु पर्याप्त होती है।
गुड़ बनाने की उन्नत विधि
स्वच्छ एवं ताजे गन्ने से निकाले गये रस को कपड़े से कढ़ाई में छानकर उसे उबलने हेतु भट्टी पर रख देना चाहिये। रस गर्म होने पर उसमें सनसनाहट की आवाज आना शुरू होती है जो कुछ समय बाद धीरे–धीरे बन्द होने लगती है। इसी समय रस मे विद्यमान नत्रजनीय पदार्थों का थक्का (मैली) रस की ऊपरी सतह पर तैरने लगता है जिसे छन्ने से उतार लिया जाता है। अब पहले से तैयार किये गये वानस्पतिक रसशोधक के घोल की कुछ मात्रा रस में डाल देते हैं, थोड़ी देर बाद मैली ऊपर आने लगती है जिसे पूर्व की भॉंति छन्ने से उतार लिया जाता है। अब भट्टी की आंच तेज कर देते हैं। इस प्रकार दो–तीन बार रसशोधक को रस में मिलाकर रस की खूब सफाई कर लेते हैं। कढ़ाई का रस जब गाढ़ा होने लगता है तो उसमें झाग बनने लगता है जिसके बाहर निकलकर गिरने की सम्भावना होती है जिसे नियंत्रित करने के लिये एक दो बूद अण्डी का तेल कढ़ाही में डाल देते हैं।
चाशनी उतारने का समय
चाशनी उतारने का समय गुड़ के प्रकार (रूप) पर निर्भर करता है। तीनों प्रकार (ठोस, तरल एवं पाउडर) के गुड़ हेतु अलग–अलग तापक्रम निर्धारित है अर्थात जिस प्रकार का गुड़ बनाना हो चाशनी को उसी तापक्रम पर उतारना चाहिये।
तरल गुड़ बनाना
चाशनी का तापक्रम जब 104 से 106 डिग्री से0ग्रे0 हो तो कढ़ाई को भट्टी से उतार लिया जाता है। ठण्डी होने पर उसमें 0.04 प्रतिशत साइट्रिक एसिड मिलाया जाता है। ऐसा करने से तरल गुड़ का रंग साफ हो जाता है साथ ही उसमें रबा बनने की सम्भावना भी नहीं रहती है। तरल गुड़ की भण्डारण क्षमता बढ़ाने, उसमें जीवाणु वृद्धि रोकने हेतु तरल गुड़ को बोतलों में पैक करने से पूर्व 0.1 प्रतिशत पोटैशियम मैटाबाईसल्फाइट अथवा 0.5 प्रतिशत बैंजोइक एसिड भी मिलाया जाना उचित रहता है।
 
ठोस गुड़ बनाना
चाशनी को 115–117 डिग्री0 से0ग्रे0 तापक्रम पर कढ़ाई को भट्टी से उतार लिया जाता है तथा थोड़ी देर रोककर उसे चाक में ट्रांसफर कर दिया जाता है फिर उसे लकड़ी के चट्टू से खूब चलाते हैं जिससे उसका रंग साफ हो जाता है। यदि गुड़ का रंग अधिक साफ करना हो तो उसे अधिक घोटना चाहिये और यदि गुड़ अधिक रबेदार बनाना हो तो कम घोटना अच्छा रहता है। गुड़ को जमने के पूर्व मनचाहा आकार देने हेतु उसे बाल्टी में, ईंट के सॉंचे में, क्यूब फ्रेम में, चौकोर भेली अथवा लड्डू बना लिये जाते हैं।
 
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