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मृदा परीक्षण एवं खादीय सुझाव


हरित क्रान्ति के समय मृदाये प्राकृतिक पोषक तत्वों से परिपूर्ण होने के कारण लघु प्रयास से खाद्यान उत्पादन में आशातीत सफलता मिली, परन्तु कृषि वैज्ञानिकों का मुख्य उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाने के कारण मृदाओं के उर्वरा स्तर में निरन्तर कमी होती गयी। परिणाम स्वरूप पिछले दशक से अनुभव किया जा रहा है कि मुख्य फसलों के औसत उत्पादन में ठहराव की स्थिति आ गयी है। मृदा अकार्वनिक कणों, सड़े हुए कार्वनिक पदार्थो, वायु एवं जल का एक मिश्रण होती है। मृदा के भौतिक गुण, मृदा के उपयोग तथा पादप वृद्धि के प्रति इसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं। ये गुण पौधों की जड़ों को मृदा में प्रवेश कराने, जल निकास एवं नमी धारण आदि में सहायक होते हैं। पादप पोषकों की प्राप्यता भी मृदा की भौतिक दशाओं से सम्बन्धित होती है लेकिन पिछले दशक में मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं में तीव्र गिरावट हुई है। अत: मृदा उत्पादकता एवं उर्वरता को ध्यान में रखते हुए फसलों के उत्पादन के लिए मृदा परीक्षण आवश्यक है।

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