आगन्तुक संख्या
web counter
 
2- व्हाइट ग्रब (गुबरैला)

यह एक बहुभक्षी कीट है जो ज्वार, बाजरा, मक्का, मॅूगफली, आलू, अदरक, उर्द, सब्जियाॅ आदि की खेती के लिए भी बहुत हानिकारक है।

इस कीट की गिडार गन्ने की पौधों की जड़ों व जमीन की सतह के नीचे वाले भाग को माह जुलाई से सितम्बर तक खाती है जिससे प्रभावित पौधा पीला होकर पूरी तरह से सूख जाता है एवं आसानी से जड़ सहित उखड़ जाता है। इस कीट का प्रकोप पेड़ी गन्ना में अधिक पाया जाता है। इस कीट के भीशण प्रकोप से गन्ने की उपज में 80-100 प्रतिषत तक की हानि पायी गयी है।

नियन्त्रण
माह अगस्त एवम् सितम्बर में खेत की तैयारी के समय दिन में 15 से 20 से0मी0 की गहरायी तक खेत की पलट हल से कई बार जुताई करने से सफेद गिडार की विभिन्न अवस्थाओं के ऊपर आ जाने के कारण चिडि़यों द्वारा खाकर नश्ट कर दिया जाता है।
1.प्रथम वर्शा के उपरान्त सफेद गिडार के भृंगों को खेत के आस-पास के पेड़ पौधों से अथवा प्रकाष प्रपंचों (लाइट ट्रैप) एवम् फेरोमोन ट्रैप (मेथाक्सी बेन्जीन युक्त) द्वारा एकत्र कर कीटनाषि मिले हुये पानी में डुबोकर नश्ट कर दे।
2.मानसून के 15 दिन पूर्व कीटनाषक क्लोथियानीडीन 50 डब्ल्यू0डी0जी0 का 250 ग्राम 1875 ली0 पानी में घोल बनाकर गन्ने की लाइन को भिगोने के उपरान्त सिचाई करा दें।
3- विवेरिया बैसियाना की 5 कि0ग्रा0/ हे0 मात्रा 1 या 2 कुंतल सड़ी हुई प्रेसमड या गोबर की खाद में मिलाकर जून के प्रथम सप्ताह में लाइनों में डालने के उपरांत सिचाई करा दें।
गन्ने के प्रमुख बेधक कीट
1-जड़ बेधक
यह कीट गन्ने के जड़ वाले भाग को नुकसान पहुॅंचाता है। इस कीट की सूड़ी अवस्था ही हानि पहुॅंचाती है। इस कीट का प्रकोप अप्रैल से अक्टूबर तक होता है। इसका प्रकोप उत्तर प्रदेष, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेष में पाया जाता है। यह कीट गन्ने के नवजात पौधों एवं गन्नों को नुकसान पहुॅंचाता है। प्रभावित पौधों की गोंफ सूख जाती है तथा खींचने से आसानी से नहीं निकलती है एवं मृतसार से किसी प्रकार की दुर्गन्ध नहीं आती है। नवजात पौधों की सतह पर एक ही छिद्र पाया जाता है। गन्ने की पत्तियों का किनारा ऊपर से नीचे की तरफ पीला होना इस कीट की क्षति की विषेष पहचान है। उ0प्र0 में यह कीट मई के प्रथम पखवारे में दिखाई देता है लेकिन जुलाई-अगस्त के महीनों में इस कीट की संख्या अधिक दिखायी देती है।
हानि
1. प्रभावित पौधों में किल्ले कम निकलते हैं।
2.गन्ने की उपज में 10 प्रतिषत की हानि होती है।
3.चीनी परता में 0.3 यूनिट की कमी पायी गयी है।
4.नवजात पौधों में प्रकोप होने पर 52 प्रतिषत प्रभावित पौधों से ब्यांत नहीं बनते हैं।
5. 52 प्रतिषत प्रभावित पौधों से ब्यांत नहीं बनते हैं।
6.30 प्रतिषत प्रभावित पौधों से एक ब्यांत बनता है।
7.18 प्रतिषत प्रभावित पौधों से दो ब्यांत बनते हैं।
नियंत्रण के उपाय
1-इस कीट के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत घोल दर 500 मि0ली0 / हे0 का दो बार (पहला बुवाई के समय, दूसरा मध्य सितंबर में) प्रयोग करना चाहिए। बुवाई के समय 1875 ली0 पानी में घोलकर तथा मध्य सितम्बर में कीटनाषक की उक्त मात्रा को 25 किग्रा मिट्टी में मिलाकर खेत में पानी भरने के उपरान्त गन्ने की पंक्तियों में प्रयोग करना चाहिए।
2.प्रभावित क्षेत्रों में गन्ने की कटाई जमीन के बराबर से करनी चाहिये।
3.ट्राइकोग्रामा काइलोनिस दर 50,000 वयस्क/हे0 का प्रत्यारोपण 15 दिन के अन्तराल पर माह जून के अन्तिम सप्ताह से माह सितम्बर तक करना चाहिये।
4. इसके अतिरिक्त प्रभावित क्षेत्रों में फसल चक्र अपनाना चाहिये।
2- अंकुर बेधक
कृषकों द्वारा इसे पिहका, कन्सुआ या सलाई आदि नामों से जाना जाता है।सूड़ी मटमैले रंग की तथा पीठ पर पाॅंच बैंगनी रंग की धारियाॅं पायीं जाती हैं। इसका प्रकोप माह अप्रैल से जून तक अधिक तापक्रम की दषा में भीषण होता है। इसकी सूड़ी पौधों के मुलायम तने में बारीक छेद बनाकर अन्दर घुसती है तथा गोंफ को खाती हुई नीचे की तरफ जाती है जिसकी वजह से गोंफ सूख जाती है जिसे मृतसार कहते हैं। मृतसार को आसानी से बाहर खींचा जा सकता है जिसमें सिरके जैसी गन्ध आती है।
हानि
गर्म मौसम में आपतन की उग्रतानुसार 5 से 40 प्रतिषत पौधे नष्ट हो जाते हैं।
नियंत्रण के उपाय
1. समुचित सिंचाई का प्रबंध करना तथा हल्की मिट्टी चढ़ाने से सॅूडी का प्रवेष कम हो जाता है।
2.प्रभावित पौघों को सूॅड़ी/प्यूपा सहित काटकर नश्ट करना चाहिए।
3.थायोमेथाक्सम 25 WSG (एक्तारा) दर 400 ग्रा0/है0 1875 ली0 पानी में घोलकर पेड़ों के ऊपर डालकर ढ़काई करना।
4. रीजेन्ट ;फिप्रोनिल 0.3 प्रतिषत रवा दरद्ध 0.3 जी दर 20.00 कि0ग्रा0/हे0।
चोटी बेधक
इस कीट की सूड़ी अवस्था हानि पहुॅंचाती है। उत्तर प्रदेष में इस कीट की पूरे वर्ष में 4-5 पीढि़याॅं पायी जाती हैं। इसे किसान कनफर्रा, मथमुइया आदि नामों से जानते हैं। सूड़ी पत्ती की मध्य षिरा से प्रवेष कर गोंफ तक पहुॅंच जाती है तथा वृद्धि स्थान को खाकर नष्ट कर देती है जिससे गन्ने की बढ़वार रुक जाती है। प्रभावित पौधे की गोंफ छोटी तथा कत्थई रंग की हो जाती है। इसे मृतसार कहते हैं जो खींचने पर आसानी से नहीं निकलती है। गन्ने की पत्ती की मध्य षिरा पर लालधारी का निषान तथा गोंफ के किनारे की पत्तियों पर गोल छर्रे जैसा छेद पाया जाता है। इस कीट की तीसरी पीढ़ी से अधिक नुकसान होता है तथा तीसरी एवं चैथी पीढ़ी के आपतन से गन्ने में बन्चीटाॅप का निर्माण हो जाता है।
हानि
1- प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी के आपतन से गन्ने के पौधे पूर्ण रूप से सूख जाते हैं।
2- तृतीय पीढ़ी से प्रभावित पौधों की बढ़वार रुक जाने के कारण उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पौधे की लम्बाई कम हो जाती है।
3- चोटी बेधक कीट के आपतन से उपज में 20 से 35 प्रतिषत तक तथा चीनी परता में 0.2 से 4.1 यूनिट तक की हानि होती है।
नियंत्रण के उपाय
1. प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी के अण्ड समूहो को मार्च एवम् मई के महीनों में पत्ती सहित तोड़कर 60 मेस के नायलान की जाली में संरक्षित कर खेत के आसपास रख दें जिससे अण्डे से परजीवी निकलकर पुनः खेत मे चली जाय।
2. प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी से प्रभावित पौधों को सूॅड़ी/प्यूपा सहित पतली खुरपी की सहायता से जमीन की गहरायी से काटकर निकालना एवं नश्ट करना।
3. कोराजन 20 प्रतिषत एस0सी0 का 150 मि0ली0/एकड़ कीटनाषक का 400 ली0 पानी में घोल बनाकर अप्रैल के अन्तिम सप्ताह या मई के प्रथम सप्ताह में नैपसेक स्प्रेयर से गन्ने की लाइन को भिगोने के उपरान्त सिंचाई करना चाहिए। उक्त रसायन के प्रयोग से अंकुरबेधक कीट का भी नियन्त्रण होता है।
4. कार्बोफ्यूरान 3 जी0 33.0 कि0ग्रा0/है0 की दर से जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक तृतीय पीढ़ी के विरूद्ध पर्याप्त नमी की दषा में पौधों की जड़ के समीप प्रयोग करना।
5. अण्ड परजीवी ट्राइकोग्रामा स्पीसीज दर 50,000 वयस्क/है0 का 15 दिन के अन्तराल पर कीट के अण्डरोपण के समय अवमुक्त करना।
6. आइसोटिमा जावेन्सिस परजीवी चोटीबेधक कीट की सूड़ी को प्राकृतिक रूप से मध्यम तापक्रम व अधिक आर्द्रता की दषा में नश्ट करता है।
तनाबेधक
यह कीट उत्तर प्रदेष के तराई क्षेत्र, बिहार, पंजाब एवम् हरियाणा में मुख्य रूप से हानि पहुॅंचाता है। इस कीट की सूड़ी हानि पहुॅंचाती है। इस कीट का प्रकोप जुलाई से अक्टूबर तक होता है। सूड़ी की पीठ पर 05 बैंगनी रंग की धारियाॅं होती हैं। नवजात पौधों में इसके प्रकोप से मृतसार पाया जाता है जो आसानी से खींचने पर बाहर नहीं निकलता है। प्रभावित पौधों की पोरियों पर छोटे-छोटे गोल छिद्र पाये जाते हैं। पोरी के अन्दर खाये हुये भाग में बुरादे जैसा बीट भरा रहता है तथा ग्रसित भाग लाल हो जाता है। प्रभावित पौधों की पत्तियाॅं पीली हो जाती हैं तथा गन्ने की बढ़वार रुक जाती है।
हानि
इस कीट के आपतन से उपज में 4 से 33 प्रतिषत एवम् चीनी परता में 0.3 से 3.7 यूनिट की कमी पायी गयी।
नियंत्रण के उपाय
1. संतुलित उर्वरक का प्रयोग करना, जल निकास की उचित व्यवस्था करना, जलीय प्ररोहों का उन्मूलन करना तथा माह अगस्त एवम् सितम्बर में (बीज गन्ना को छोड़कर) नीचे की सूखी पत्तियों को निकालकर नीचे गिरा देना।
2. गन्ने को गिरने से बचाने हेतु माह जून-जुलाई में मिटटी चढ़ाना तथा जुलाई-अगस्त में गन्ने की बंधाई करना।
3. माह जून से सितम्बर तक 15 दिनों के अन्तराल पर ट्राइकोग्रामा स्पीसीज दर 50,000 वयस्क/हे0 का प्रत्यारोपण करना।
4. कोटेसिया फ्लेविप्स तना बेधक कीट की सूड़ी का प्राकृतिक परजीवी है। मानसून के बाद आर्द्रता अधिक होने पर इस परजीवी द्वारा प्रकृति में 40-60 प्रतिषत तक तना बेधक की सूडि़यां नष्ट हो जाती हैं।
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12