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गन्ने के प्रमुख चूसक कीट
गन्ना फसल को हानि पहुॅंचाने वाले नाषिकीटों में चूषक कीट का भी विषेष महत्व है। यह कीट गन्ने की पत्तियों तथा तनों से पौधों का रस चूसते हैं जिसके कारण पौधों की पत्तियाॅं पीली पड़ जाती हैं। गन्ना फसल में लगने वाले प्रमुख चूषक कीट निम्नवत् हैंः-
1-काला चिकटा
यह कीट पूरे उत्तर प्रदेष में पाया जाता है परन्तु पष्चिमी जिलों में इसका प्रकोप अधिक देखा गया है। इसका प्रकोप अप्रैल-मई माह में पेड़ी में अधिक रहता है। प्रभावित पौधों की पत्तियाॅं पीली हो जाती हैं तथा उन पर कत्थई रंग के धब्बे पाये जाते हैं। इसके षिषु पत्रकंचुक एवं गोंफ के मध्य मंे मई तक पाये जाते हैं। प्रौढ़ तथा षिषु दोनों पत्तियों का रस चूसते हैं जिससे गन्ने की बढ़वार रुक जाती है तथा उपज व षर्करा में कमी हो जाती है।
नियंत्रण
1.प्रभावित क्षेत्रों में पताई तथा ठूॅंठों को गन्ना कटाई के बाद जलाना।
2. ठूॅंठों से निकले किल्लों को अप्रैल के अन्त तक खेत से निकालने तथा कटाई के बाद खेत की सिंचाई करने से इस कीट का आपतन कम होता है।
3. ग्रीष्मकाल में प्रकोप होने पर निम्न में से किसी एक कीटनाषक का छिड़काव 625 ली0 पानी में घोलकर कट नाजिल से करना चाहिये :-
अ- इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत घोल दर 150-200 मि0ली0 / हे0 ।
ब- क्वीनॉलफॉस 25 प्रतिशत ई0सी0 दर 800 मि0ली0 / हे0 ।
स- डाइक्लोरवास 76 प्रतिशत ई0सी0 दर 250 मि0ली0 / हे0 ।
पायरिला
गन्ना फसल में पायरिला एक प्रमुख चूषक कीट है। इसका प्रकोप उत्तर प्रदेष में 5-6 वर्ष बाद भीषण रूप से आता है। इस कीट का प्रकोप माह अप्रैल से अक्टूबर तक रहता है। इस कीट के निम्फ तथा प्रौढ़ पत्तियों से रस चूसते हैं जिससे पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। यह कीट मल के रूप में एक चिपचिपा मधुरस छोड़ता है जिससे पत्तियों पर काली फफूॅदी लग जाती है जो पत्तियों की भोजन बनाने की प्रक्रिया को बाधित करती है जिससे फसल की बढ़वार रूक जाती है।
हानि
इस कीट के आपतन से उपज में 15-20 प्रतिषत तथा चीनी के परते में 0.2-5.0 यूनिट तक की क्षति हो जाती है। अधिक प्रकोप होने पर यह कीट अन्य फसलों जैसे- ज्वार, बाजरा, मक्का को भी हानि पहुँचाता है।
नियंत्रण
1. पायरिला के अण्ड परजीवी जैसे टेट्रास्टिकस पायरिली, काइलोन्यूरस पायरिली एवं ओनसिरटस पैपीलियोनस द्वारा प्रकृति में लगभग 80 प्रतिषत पायरिला की संख्या मानसून के बाद नियन्त्रित हो जाती है।
2. मेटाराइजियम एनीसोपली फफूँदी प्रकृति में पायरिला को नश्ट करती है। मानसून के बाद उक्त फफूँदी के स्पोर का छिड़काव करने पर कम तापक्रम व अधिक आर्द्रता के कारण यह पायरिला की संख्या 94 प्रतिषत तक कम कर देती है।
3. अगर प्रभावित फसल में परजीवी के ककून न दिखाई दे ंतो ऐसी स्थिति में निम्न में से किसी एक कीटनाषक का छिड़काव 625 ली0 पानी में घोल बनाकर करना लाभकारी होता है।
4. डायमेथोएट 30 प्रतिषत ई0सी0 दर 1 ली0/हे0 या प्रोफेनोफॉस 40 प्रतिषत + साइपर 4 प्रतिषत घोल दर 750 मि0ली0/हे0।या क्वीनालफॉस 25 प्रतिशत घोल दर 800 मि0ली0 / हे0 अथवा डाइक्लोरवास 76 प्रतिशत घोल दर 315 मि0ली0 / हे0 ।
5. प्रभावित फसल की कटाई के उपरान्त खेत में सूखी पत्तियों को जला देना चाहिये।
सफेद मक्खी
भारतवर्ष में सफेद मक्खी की तीन प्रजातियाँ एल्यूरोलोवस वैरोडेन्सिस, नियोमास्केलिया वार्गाई और नियोमास्केलिया एन्ड्रोपोगोनिस पायी जाती हैं जिनमें से एन्ड्रोपोगोनिस केवल उत्तर प्रदेष में बाकी दोनों प्रजातियाँ पूरे भारतवर्ष में पायी जाती हैं। इसका प्रकोप पानी भरे हुये तथा नत्रजन की कमी वाले प्रक्षेत्रों पर अधिक होता है। इस कीट के षिषु पत्ती की निचली सतह से रस चूसकर हानि पहुँचाते हैं जिसकी वजह से पत्तियाँ पीली होकर सूख जाती हैं।
हानि
इससे उपज में लगभग 23.4 प्रतिषत तथा षक्कर के परते में 1.21 से 2.80 इकाई तक की कमी आ जाती है। ये कीट गन्ना, ज्वार, बाजरा, मक्का,गेहूँ तथा जौ पर भी पाये जाते हैं।
नियंत्रण
1. बावग तथा पेड़ी में प्रचुर मात्रा में नत्रजन का प्रयोग करना। 2. जलप्लावित क्षेत्रों में पानी के निकास की व्यवस्था करना।
3. प्रभावित पत्तियों को खेत से बाहर निकालने से कीट का प्रभाव कम हो जाता है। अगस्त से सितम्बर में प्रकोप होने पर किसी एक कीटनाषक का छिड़काव 1250 ली0 पानी में घोल बनाकर करना चाहियेः-
a) फेनिट्रोथियान 50 प्रतिषत घोल दर 1 ली0/हे0।
b- इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत घोल दर 170 मि0ली0 / हे0 ।
गुलाबी चिकटा या मिलीबग
पूरे विश्व में इस कीट की 30 प्रजातियाँ गन्ने में पाई जाती हैं जिनमें से 06 प्रजातियाँ केवल भारत में पाई जाती हैं। गुलाबी चिकटा प्रजाति भारत में सबसे अधिक मिलती है। मादा कीट गुलाबी रंग की तथा गोल या चपटे आकार की होती है। ये कीट समुदाय में गन्ने की गाँठो पर पाये जाते हैं तथा तने से रस चूसते हैं। इस कीट के अधिक आपतन से गन्ने की बढ़वार रुक जाती है तथा गन्ने की पत्तियाँ पीली होने लगती हैं। कभी-कभी पूरी फसल सूख जाती है। गन्ने के तने पर चिपचिपा मधु स्राव होने से ब्लैक सूटी मोल्ड का प्रभाव हो जाता है। सूखे की दषा में इस कीट का प्रभाव अधिक होता है तथा बरसात के कारण एस्परजीलस पैरासीटीकम नामक फफूँदी के प्रभाव से इसकी संख्या में कमी आती है। जुलाई-अगस्त के महीनों में इसका आपतन अधिक पाया जाता है। देर से पकने वाली प्रजातियों में इस कीट का प्रभाव अधिक होता है।
हानि
इसकी वजह से उपज में 20 प्रतिशत तथा सुक्रोज में 30 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है।
नियंत्रण
कल्चरल विधि
1- प्रभावित गन्ने के टुकड़ों को नहीं बोना चाहिये।
2- गन्ने के टुकड़ों की लीफ शीथ को बोने से पहले हटा देना चाहिये तथा पानी में 72 घण्टे तक भिगोकर बोना चाहिये।
3- प्रभावित खेत में गन्ने की कटाई जमीन की सतह से करनी चाहिये।
4- प्रभावित क्षेत्रों में बार-बार पेड़ी की फसल नहीं लेनी चाहिये।
रासायनिक विधि
इमिडाक्लोप्रिड 150 से 200 मि0ली0/हे0 को 625 ली0 पानी मंे घोल बनाकर छिड़काव प्रभावी पाया गया है।
जैविक नियन्त्रण
एनागाइरस सैकरीकोला शिशु एवं वयस्क का परजीवी, एनागाइरस स्वीजाइ अण्ड परजीवी तथा क्रिप्टोलीमस मोनट्राजेराई एवं क्राइसोपा स्पीशीज मिली बग का भक्षी कीट है।
थ्रिप्स
थ्रिप्स पत्ती के इपीडर्मिस के अन्दर अण्डा देता है जिससे निम्फ निकलकर पत्ती का रस चूसते हैं जिसके कारण पत्ती का अग्रभाग मुड़ जाता है। गर्मी का मौसम इनकी जनसंख्या वृद्धि में सहायक होता है। वर्षा के प्रारम्भ होते ही इनकी जनसंख्या में कमी होने लगती है।
नियंत्रण
माह मई-जून में प्रकोप होने पर 625 ली0 पानी में निम्न में से किसी एक कीटनाषक का घोल बनाकर प्रति हे0 की दर से छिड़काव करना चाहिये।
1- एल्सान 50 प्रतिषत घोल 0.50 ली0/हे0।
2- डाईमेथोएट 30 प्रतिषत घोल 1.0 ली0/हे0।
3- नुवाक्रान 36 प्रतिशत घोल दर 0.75 ली0 / हे0 ।
गन्ने की पत्ती कुतरकर हानि पहुंचाने वाले कीट

गन्ना फसल की पत्तियों को कुतरकर हानि पहुॅंचाने वाले कीटों में ग्रासहाॅपर, सैनिक कीट एवं स्लग कैटरपिलर (करन्ट कीट) प्रमुख हैं।

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