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हानियॉं
1
इस रोग के कारण जमाव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कम जमाव से उपज में ह्रास होता है।
2
अगोला सूख जाने के कारण कृषक को चारे के लिए अगोला उपलब्ध नहीं हो पाता है।
3
गन्ने में इस रोग के लग जाने पर वैज्ञानिकों को वह प्रजाति सामान्य खेती से हटानी पड़ती है। साथ ही नयी काना रोगरोधी जाति विकसित करनी पड़ती है।
4
गन्ने में चीनी बनते समय गॉंठों में ब्याधिजन होने के कारण इन्वर्टेज नामक इन्जाइम पैदा होता है जिससे सुक्रोज, ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज में टूट जाता है। ये दोनों शर्करायें क्रिस्टल के रूप में जम नहीं पाती हैं। अत: इससे शीरे की मात्रा बढ़ती है तथा चीनी का परता घटता है।
5
महामारी के समय पूरे के पूरे खेत रोग के कारण सूख जाते हैं जिससे कृषक को उपज नहीं मिल पाती है। इसके अतिरिक्त फसल में रोग का आपतन होने पर उपज में ह्रास होता है जोकि 44 प्रतिशत तक हो सकता है।
2.कंडुआ रोग (Smut)
यह बीज जनित रोग है जो स्पोरिसोरियम सीटेमिनियम नामक फफूंदी से होता है। रोगी पौधों की पत्तियॉं छोटी, पतली, नुकीली हो जाती हैं तथा गन्ना लम्बा एवं पतला हो जाता है। बाद में गन्ने की गोंफ में से एक काला कोड़ा निकलता है जो कि सफेद पतली झिल्ली द्वारा ढका होता है। यह झिल्ली हवा के झोंकों द्वारा फट जाती है, फलस्वरूप रोग के बीजाणु बिखर जाते हैं तथा आसपास के पौधों में द्वितीयक संक्रमण पैदा करते हैं।यह रोग मुख्यत: तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा केरल राज्यों में अधिक पाया जाता है। उ0प्र0 में यह रोग वर्ष भर देखने को मिलता है परन्तु अप्रैल, मई, जून तथा अक्टूबर, नवम्बर एवं फरवरी माह में इस रोग की तीव्रता अधिक पायी जाती है। प्रजाति को0 1158  इस रोग से पूरी तरह ग्रस्त हैं। पेड़ी में यह रोग बावग की तुलना में अधिक पाया जाता है।
हानियाँ
1
इस रोग के कारण उपज में 30 से 70 प्रतिशत तक ह्रास देखा गया है।
2
प्रभावित गन्नों के रस से खराब गुणवत्ता का गुड़ बनता है।
3
रोगी गन्ने से रस का ब्रिक्स, सुक्रोज तथा प्योरिटी बुरी तरह प्रभावित होती है।
4
स्वस्थ गन्ने की तुलना में 10 प्रतिशत रस की कमी तथा 7 प्रतिशत तक सुक्रोज में कमी पाई गई है।
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