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3.उकठा रोग (Wilt)
यह भी गन्ना बीज तथा मृदा जनित रोग है जोकि भारत वर्ष के लगभग सभी राज्यों में पाया जाता है। इस रोग का प्रसार बीज एवं मृदा से होता है। यह रोग गन्ने के लाल सड़न रोग, पाइन ऐपिल रोग तथा बोरर्स एवं स्केल इन्सेक्ट के साथ संयुक्त रूप से भी पाया जाता है। इस रोग के कारण अतीत में गन्ने की बहुत सी जातियॉं जैसे– को0 527, 951, 1007, 1223, को0शा0 445, 321 आदि सामान्य खेती से हटाई गयी हैं। यह रोग फ्यूजेरियम मोनिलीफोर्मी, सिफेलोस्पीरियम सेकराई अथवा एक्रीमोनियम स्पीसीज द्वारा होता है। उकठा रोग के लक्षण मानसून के बाद देखने को मिलते हैं। इसमें या तो एक पौधा अथवा पौधों के छोटे झुण्डों में अगोले में पीलापन प्रारम्भ होने लगता है। प्राय: पत्ती की मध्य शिरा पीली पड़ जाती है और पत्ती का अन्य भाग हरा रहता है। गन्ने धीरे–धीरे हल्के एवं अन्दर से खोखले हो जाते हैं। गन्नों को लम्बवत् फाड़ने पर गूदे का रंग हल्का बैंगनी अथवा गहरे लाल रंग का दिखाई देता है। गन्ने में सिरके अथवा एल्कोहल जैसी गन्ध नहीं आती है तथा गन्ना गॉंठों पर से आसानी से नहीं टूटता है। प्रभावित गन्ने की पोरियां पिचक जाती है । ऐसे गन्नों के अन्दर फफूंदी के असंख्य बीजाणु भरे होते हैं। यह रोग प्राय: उन क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है जहॉं फसल में कीटों का आपतन अधिक होता है तथा कृषक उचित फसल चक्र नहीं अपनाते साथ ही जल निकास का उचित प्रबन्ध भी नहीं करते हैं।
हानियॉं
1
इस रोग में गन्ना सूखने के कारण उपज पर काफी प्रभाव पड़ता है।
2
इस रोग के कारण जमाव प्रभावित होता है जिसके फलस्वरूप फसल में गैप अधिक हो जाता है।
3
उकठा रोग के आपतन के कारण 65 प्रतिशत तक उपज में ह्रास अंकित किया गया है।
4
इस रोग के कारण रस में 14.6 से 25.8 प्रतिशत तक तथा रिकवरी में 3 से 29 प्रतिशत तक की कमी पाई गई है।
4.घासीय प्ररोह रोग (Grassy shoot disease)
इस रोग को विवर्ण रोग, ग्रासीशूट या एल्बिनो भी कहते हैं। बुवाई के कुछ दिनों बाद से ही इस रोग के लक्षण परिलक्षित होने लगते हैं। परन्तु विशेष रूप से इस रोग का प्रभाव वर्षाकाल में होता है। रोगी पौधों के अगोले की पत्तियों में हरापन बिल्कुल समाप्त हो जाता है जिससे पत्ती का रंग दूधिया हो जाता है और नीचे की पुरानी पत्तियों में मध्य शिरा के समानान्तर दूधिया रंग की धारियॉं पड़ जाती हैं। थानों की वृद्धि रुक जाती है। गन्ने बौने और पतले हो जाते हैं तथा ब्यॉंत बढ़ जाने से पूरा थान झाड़ी नुमा हो जाता है।
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