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हानियॉं
1
इस रोग के कारण पौधों का हरापन कभी–कभी बिल्कुल गायब हो जाता है जिसके फलस्वरूप किल्ले सूख जाते हैं तथा खेत गैपी हो जाता है।
2
इस रोग के कारण फसल में मिल योग्य गन्ने कम तथा पतले बनते हैं। इससे भी उपज में गिरावट आती है।
3
इस रोग से ग्रसित गन्नों में सुक्रोज कम होता है साथ ही रिड्यूसिंग शुगर बढ़ जाती है जिससे सुक्रोज के क्रिस्टल नहीं बनते हैं।
5.पर्णदाह(Leaf scald)
लीफ स्काल्ड को पतसूखा रोग भी कहते हैं। यह एक शाकाणुजनित रोग है जोजेन्थोमोनास एलबिलिन नामक बैक्टीरिया द्वारा होता है । प्रारम्भ में रोगी गन्ने की पत्तियों तथा पत्र कंचुक पर हल्के सफेद रंग की धारियॉं बन जाती हैं। पत्तियों की बढ़वार के साथ हल्की सफेद धारियॉं चौड़ी होकर गुलाबी रंग की हो जाती हैं। पत्तियॉं विशेषकर अगोले से कुछ कड़ी व अन्दर की ओर मुड़ी होती हैं जिनके सिरे झुलसे हुये प्रतीत होते हैं। रोगी गन्ने की सभी आंखों का जमाव होकर किल्ले निकल आते हैं। रोगी गन्ना चीरने पर अन्दर गूदे में लाल रंग की बारीक धारियॉं होती हैं जो पोरी में कहीं–कहीं दिखाई देती हैं।
हानियॉं
1
रोगी गन्ने की लम्बाई स्वस्थ गन्ने की तुलना में कम हो जाती है।
2
रोगी गन्नों की ब्रिक्स तथा प्योरिटी में कमी आती है तथा साथ ही उनकी शुगर रिकवरी प्रतिशत में कमी आती है।
गौण रोग (Minor disease)
1.पत्ती का लालधारी रोग (Red stripe)
यह शाकाणुजनित रोग है जो स्यूडोमोनास रुब्रीलिएन्स नामक बैक्टीरिया से होता है । इसका आपतन गन्ने की फसल पर जून से वर्षा ऋतु के अन्त तक रहता है। प्रारम्भिक अवस्था में पत्ती के डण्ठल के पास हरे रंग की जलीय धारियॉं उत्पन्न हो जाती हैं जो कुछ दिनों बाद सुर्ख लाल होकर लम्बाई में फैल जाती हैं व नसों के सामानान्तर होती हैं। ये धारियॉं कुछ से0मी0 से लेकर पत्ती की पूरी लम्बाई तक हो सकती हैं जो बाद में परस्पर मिलकर चौड़ी हो जाती हैं। ये धारियॉ अधिकतर नई पत्तियों पर ही निचली सतह पर पायी जाती हैं। इन धारियों पर पत्तियों के निचले भाग वाले रंग में रोग के असंख्य शाकाणु रहते हैं जिनके स्पर्श से स्वस्थ गन्ने की पत्तियॉं भी रोगी हो जाती हैं।
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