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2.गूदे का सड़न रोग (Stinking Rot)

यह एक शाकाणुजनित रोग है जो स्यूडोमोनास डेसियाना तथा जुलाई से अक्टूबर तक दिखाई देता है। वर्षाकाल में नमी व तापक्रम अधिक होने से रोग का प्रकोप बढ़ता है। वर्षाकाल समाप्त होने पर नमी कम हो जाती है। साथ ही तापक्रम गिर जाता है जिससे इस रोग का प्रभाव भी कम हो जाता है।

प्रभावित गन्नों में गूदे की सड़न ऊपर से नीचे की ओर आरम्भ होती है। रोग शुरू होने पर अगोले के बीच की पत्तियॉं सूखने लगती हैं तथा बाद में पूरा अगोला ही सूख जाता है। रोग के शाकाणु पौधे के शिखर कलिका तक पहुंच कर वहॉं के तन्तुओं पर आक्रमण कर देते हैं जिससे वृद्धि स्थान सड़ने लगता है एवं पौधे की वृद्धि रुक जाती है तथा पौधों का भीतरी भाग ऊपर से नीचे की ओर सड़ता चला जाता है। गूदे के सड़ाव से बदबूदार गंध आती है। ऐसे रोगी पौधों को ऊपर से दबाने पर तरल पदार्थ (चिपचिपा) सा प्रतीत होता है। अगोला साधारणतया हल्के झटके से टूट जाता है। सड़ा हुआ गूदा जो कि पनीला एवं हल्के भूरे रंग का होता है, निकलकर बहने लगता है, जिसमें रोग के असंख्य शाकाणु रहते हैं जो वर्षा होने पर फैलकर संक्रमण करते हैं।

पत्ती की लालधारी व गूदे की सड़न रोग से उपज में 15 प्रतिशत तक हानि पाई जाती है। प्राय: थान का गन्ना सूखकर नष्ट हो जाता है तथा अधिक आपतन की दशा में थान के सभी कल्ले नष्ट हो जाते हैं। जब पत्ती की लालधारी के साथ गूदे की सड़न प्राररम्भ हो जाती है तो फसल को काफी हानि देखी गई है।

3.पेड़ी का कुंठन रोग (Ratoon Stunting Disease)
यह रोग भी शाकाणुजनित रोग है जोकि बीज गन्ना द्वारा फैलता है तथा लीफसानिया जाइली द्वारा फैलता है। यह रोग भारत में सर्वप्रथम 1956 में, को0शा0 510 प्रजाति में, गोला गोकर्णनाथ, जनपद–लखीमपुर खीरी में देखा गया था। इस रोग के लक्षण प्राय: पूर्णतया स्पष्ट नहीं हो पाते हैं। ऐसे बीज का प्रयोग करने से फसल भी रोगी हो जाती है। यह रोग बावग एवं पेड़ी दोनों की प्रकार की फसल में देखा गया है परन्तु पेड़ी फसल में ही अधिक पाया जाता है। इस रोग से प्रभावित पौधे पतले एवं छोटे हो जाते हैं तथा कभी–कभी थान के पूरे गन्नों की संख्या भी कम होने लगती है। छोटी उम्र के गन्ने चीरने पर गॉंठों का रंग हल्का गुलाबी दिखाई देता है। उन्नतशील जातियों का ह्रास हो जाता है। बावग की अपेक्षा पेड़ी में अधिक हानि होती है। जमाव कम होकर बढ़वार में काफी कमी आ जाती है। फलत: उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मौजेक रोग (Mosaic)

यह एक विषाणुजनित रोग है जो बीज एवं एफिड सैकेराई व कुछ अन्य कीटों द्वारा पत्ती से रस चूसने से फैलता है। यह मुख्य रूप से पत्ती का रोग है। इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्ती पर आते हैं परन्तु कभी–कभी लीफ शीथ पर भी इसके लक्षण दिखाई देते हैं। पत्तियों पर सफेद रंग की छोटी–छोटी बहुत सी धारियॉं पड़ जाती हैं जो धब्बे बनाती हैं जिससे पत्तियॉं चितकबरी हो जाती हैं। ये धारियॉं नसों के समानान्तर बढ़ती हैं जो हरे रंग में धुंधली सी प्रतीत होती हैं। यह बीमारी पौधे की नई पत्तियों से शुरू होती है। पुरानी पत्तियों में इसके लक्षण स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं।

रोग की अधिक व्यापकता पर अगोला पीला होकर सूखने लगता है व फसल सूखती हुई नजर आती है जिससे पैदावार कम हो जाती है और रसोगुण भी खराब हो जाता है।

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