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पत्ती का भूरा धब्बा रोग (Brown leaf spot)

यह एक फफूंदी जनित रोग है।जो सर्कोस्पोरा लान्जीपस नामक फफूंद द्वारा होता है।इस रोग का आपतन मध्य जून व जुलाई से प्रारम्भ होता है। गन्ने में ऊपर से 5–6 पत्तियों को छोड़कर नीचे की पत्तियों की सतह पर जगह–जगह जल की बूदों जैसे श्वेत धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में हल्के पीले रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। बाद की अवस्था में धब्बों को सावधानीपूर्वक देखें तो जगह–जगह पर डाट जैसा गाढ़ा कत्थई रंग दिखाई देता है।

रोग के आपतन से पत्तियों में क्लोरोफिल नष्ट हो जाता है जिसके फलस्वरूप भोजन बनाने की प्रक्रिया इन ऊतकों में समाप्त हो जाती है। रोग के प्रभाव से गन्ने की बढ़वार बरसात में रुक जाती है।

आई स्पॉट डिसीज (Eye spot)
यह फफूंदीजनित रोग है जो बाइपोलेरिस सेकेराई द्वारा होता है तथा पत्तियों पर फफूंदी से उत्पन्न होने वाले धब्बों के रोगों में यह प्रमुख है। वर्षाकाल में यह रोग प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ में पत्तियों पर छोटे–छोटे जलीय धब्बे बनते हैं जोकि बाद में लम्बाई में बढ़कर आंख के समान बड़े हो जाते हैं। इन धब्बों के बीच का भाग लाल व किनारे भूसे के रंग के हो जाते हैं। कुछ ही दिनों के पश्चात् धब्बों के सिरे से पतली, लम्बी व लाल रंग की धारी जिन्हें रनर्स कहते हैं, निकलती हैं जो पत्ती के ऊपरी भाग की ओर कई से0मी0 तक लम्बी लकीर जैसी हो जाती है। अनुकूल वातावरण होने पर ये धारियॉं (रनर्स) पत्ती की पूरी लम्बाई तक फैल जाती हैं। रोग का आपतन जलभराव वाले क्षेत्रों में अधिक होता है।
बैंडेड स्कलोरेशियल रोग (Banded sclerotial disease)
यह फफूंदीजनित रोग है। जो राइजेक्टोनिया सोलेनाई द्वारा होता है। यह प्राय: वर्षा के प्रारम्भ में होता है। इस रोग में प्राय: पौधे की, पुरानी जमीन की सतह के पास की पत्तियॉं प्रभावित होती हैं। आक्रान्त पत्तियों व लीफ शीथ पर बहुत बड़े अनियमित आकार के हल्का पीलापन लिये हुये भूसे के रंग के धब्बे बनते हैं जिनके किनारे लाल बादामी रंग के होते हैं। पत्तियों पर एक क्रम में आरपार बैण्ड पाये जाने के कारण इस रोग को बैंडिड स्कलोरेशियल नाम दिया जाता है। यह रोग प्राय: अधिक गर्म व उच्च आर्द्रता वाले महीनों (अगस्त–सितम्बर) में पाया जाता है। बाद की अवस्था में प्रभावित पत्तियॉं सूख जाती हैं। यह रोग नीचे की पुरानी पत्तियों तक सीमित रहता है। इसलिये ज्यादा हानि नहीं होती है।
गन्ने का रतुआ रोग (Rust of sugarcane)
यह फफूंदीजनित रोग पत्तियों पर आता है। जो पक्सीनिया कुहनी द्वारा होता है। उ0प्र0 में इसका संक्रमण वर्षा बाद अक्टूबर–नवम्बर के महीनों में पाया जाता है। पत्तियों की दोनों सतहों पर इस रोग के पिस्सच्यूल्स बनते हैं। पहले नयी पत्तियों पर सूक्ष्म लम्बाई के पीले धब्बे आते हैं जोकि प्राय: 2 से 10 मि0मी0 लम्बाई के एवं 1–3 मि0मी0 चौड़ाई के होते हैं। बाद की अवस्था में इन पिस्सच्यूल्स का रंग बादामी हो जाता है। रोग के बढ़ने पर थान के सभी गन्नों के अगोले प्रभावित हो जाते हैं। रोग की प्रचण्डता होने पर पिस्सच्यूल् लीफ शीथ पर भी आते हैं तथा पूरा अगोला दूर से भूरे रंग का दिखाई देता है। उच्च आर्द्रता (70 से 90 प्रतिशत) होने पर रोग का तेजी से प्रसार होता है। घने बादल एवं तेज हवायें रोग के बीजाणु फैलाने में सहायक होती हैं। रोग की प्रचण्डता होने पर अगोला प्रभावित होता है जिससे उपज प्रभावित होती है।
 
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