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फसल चक्र का अपनाना
रोगयुक्त फसल के खेत में सफाई के उपरान्त एक वर्ष तक गन्ना न बोयें। इस बीच सुविधानुसार अन्य फसलें ले सकते हैं। इस हेतु धान तथा गेहूं का फसल चक्र अच्छा रहता है।
जल निकास का उचित प्रबन्ध
गन्ने के खेत में जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिये। यदि रोगी खेत का जल स्वस्थ गन्ने के खेत में आता है तो रोग पैदा होने की काफी सम्भावनायें होती हैं। अत: रोगी खेत का जल स्वस्थ खेत में आने से रोकना चाहिये।
गन्ने के विभिन्न रोगों के रासायनिक तथा जैविक उपचार

अ– उकठा तथा पाइन एपिल रोग हेतु उ0प्र0 गन्ना शोध परिषद्, शाहजहॉंपुर द्वारा विकसित बायोएजेन्ट ’’अंकुश’’ (ट्राइकोडर्मा स्पीसीज) को 10 कि0ग्रा0 प्रति हेक्टेयर की दर से 100–200 कि0ग्रा0 कम्पोस्ट खाद के साथ मिलाकर 20–25 प्रतिशत तक नम करके खेत की तैयारी के समय अन्तिम जुताई के पूर्व खेत में बिखेर देनी चाहिये अथवा बुवाई के समय कूंड़ों में पैडों के ऊपर डालना चाहिए।

ब– उकठा रोग हेतु बुवाई के समय सल्फर 50 कि0ग्रा0/है0 की दर से खेत में डालने के साथ–साथ जिंक 0.5 प्रतिशत का पर्णीय छिड़काव करने से रोग पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।

स– पोक्का बोइंग तथा आई स्पॉट रोग हेतु इसके लक्षण प्रकट होते ही कॉपर आक्सीक्लोराइड के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिये।

द– पत्ती का भूरा धब्बा रोग हेतु मैन्कोजेब नामक दवा का 0.25 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिये।

र– रतुआ रोग हेतु मैक्कोजेब या डाइथेन M-45 का 0.2 प्रतिशत घोल के 2 से 3 छिड़काव नवम्बर से फरवरी तक करना चाहिये।

ल– कण्डुआ रोग के प्राथमिक संक्रमण को कम करनेहेतु गन्ने के पैड़ों को बोने से पूर्व कार्बेन्डाजिम (बेबिस्टीन) के 0.2 प्रतिशत घोल में 5 मिनट के लिये डुबोना चाहिये।

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