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दैहिकीय संस्तुतियॉं
1
गन्ना फसल को ब्यॉंत बनने की अवस्था में पानी की कमी नहीं होनी चाहिये क्योंकि इससे उपज एवं शर्करा प्रतिशत पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
2
कम पानी की दशा में गन्ना फसल में तीन सिंचाई (अप्रैल, मई एवं जून) अत्यन्त आवश्यक होती हैं।
3
कम पानी अथवा सूखे से बचाव हेतु 6 प्रतिशत काओलिन रसायन का पर्णीय छिड़काव पौधे में नमी संरक्षण में सहायक होता है।
4
कम पानी की दशा में, गन्ने की बुवाई के तीन माह बाद पौधों की लाइनों के बीच 3.5 टन/हे0 की दर से गन्ने की सूखी पताई बिछाने से फसल को अधिक समय तक नमी उपलब्ध रहती है जिससे उपज ह्रास कम होता है।
5
ऊसर भूमि में गन्ना खेती हेतु को0शा0 767, को0शा0 97261, को0शा0 99259, को0शा0 08279, को0से0 01424,को0से0 01434 तथा को0शा0 07250  प्रजातियॉं उपयुक्त हैं।
6
गन्ना कटाई उपरान्त पेराई में विलम्ब होने की दशा में कटे गन्नों को सूखी पताई से ढककर पानी का छिड़काव कर अथवा सोडियम एजाइड (1%) का छिड़काव कर वजन एवं शर्करा ह्रास को कम किया जा सकता है।
7
कम पानी की दशा में गन्ना फसल की खेती हेतु को0शा0 767, को0शा0 94257, को0से0 95422, को0शा0 08279, को0शा0 97261, को0शा0 97264  को0से0 01424,को0से0 01434 एवं को0शा0 07250 प्रजातियॉं उपयुक्त हैं।
8
गन्ना प्रजनन जैसे महत्वपूर्ण कार्य को द्रष्टिगत रखते हुए गन्ने की विभिन्न प्रजातियों को जुलाई से अक्टूबर तक प्रतिदिन ४ घंटे का अतिरिक्त अन्धकार दे कर पुष्पित कराया जा सकता है।
9
गन्ने की व्यवसायिक खेती में पुष्पन के कारण गन्ना उपज तथा सर्करा में हानि को देखते हुए पुष्पित गन्ने की मिल आपूर्ति यथाशीघ्र कर देना चाहिए।