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गन्ना के प्रमुख नाशिकीटों का जैविक नियन्त्रण
गन्ना फसल में नाषिकीटों के आपतन से प्रति वर्ष किसानों को उपज में लगभग 20-25 प्रतिषत तथा चीनी मिल को 10-15 प्रतिषत चीनी के परता में हानि होती है। गन्ने में नाषिकीटों के नियन्त्रण हेतु कृषकों द्वारा विभिन्न प्रकार के नाषि रसायनों का प्रयोग किया जाता है जोकि पर्यावरण हेतु सुरक्षित नहीं होता है। गन्ना फसल में नाषिकीटों के नियन्त्रण हेतु प्रयोगषाला में उत्पादित परजीवी, परभक्षी एवं ब्याधिजनों का प्रयोग करना जैविक नियन्त्रण कहलाता है।
1- बेधक कीटों का जैविक नियन्त्रण
क- ट्राइकोग्रामा स्पी0
गन्ने में बेधकों को नियन्त्रित करने हेतु ट्राइकोग्रामा की दो स्पीसीज ट्राइकोग्रामा काइलोनिस एवं ट्राइकोग्रामा जापोनिकम का प्रयोग देष के विभिन्न भागों में किया जा रहा है। यह परजीवी बेधकों के अण्डे की अवस्था को नश्ट कर देता है जिससे बेधक की पीढ़ी नश्ट हो जाती है तथा परजीवी की पीढ़ी (संतति) अनुकूल वातावरण पाकर बढ़ने लगती है। तामिलनाडु प्रान्त में ट्राइकोग्रामा काइलोनिस के 50, 000 अण्ड परजीवी/हे0/सप्ताह की दर से अवमुक्त करने से बेधकों को नियन्त्रित करने में काफी सफलता मिली। आन्ध्र प्रदेष में ट्राइकोग्रामा काइलोनिस के 50000 परजीवी/एकड़ अवमुक्त करने से अंकुर बेधक कीट का प्रभावी नियन्त्रण हुआ।
ख- आइसोटिमा जावेन्सिस

यह परजीवी चोटी बेधक कीट के सूड़ी अवस्था को प्रकृति में नश्ट करता हैं। उक्त परजीवी को वर्श 1958 में मुजफ्फरनगर से तमिलनाडु में छोड़ा गया। इस परजीवी को तमिलनाडु व कर्नाटक प्रान्त में छोड़ने से चोटी बेधक कीट के सूड़ी पर 81 प्रतिषत परजीविता पाई गई। दक्षिणी भारत में मध्यम तापक्रम व अधिक आर्द्रता होने के कारण इस परजीवी का प्रकृति में सम्बर्धन होता रहता है जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेष में मानसून के पूर्व अधिक तापक्रम व कम आर्द्रता होने के कारण इनके द्वारा सूडियाॅ कम नश्ट हो पाती है जबकि मानसून के समय इनकी संख्या में वृद्धि पायी जाती है।

सर्वेक्षण के दौरान पूर्वी उ0प्र0 में इस परजीवी द्वारा 16 से 20 प्रतिषत सूडियाॅ नश्ट हुई हैं। उक्त परजीवी के सम्वर्धन हेतु किसी उपयुक्त होस्ट के सम्वर्द्धन का कार्य प्रयोगषाला में सम्भव नही होने के कारण बड़े पैमाने पर इनका उत्पादन नहीं हो पाता है परन्तु प्राकृतिक परजीवी के रूप में इनके द्वारा चोटी बेधक की सूडियाॅ 20 प्रतिषत तक नियंत्रित की जा सकती है।

ग- कोटेषिया फ्लेविप्स

यह तना बेधक कीट का बहुत महत्वपूर्ण परजीवी है। पूर्वान्चल में वर्श 1997 में 10-12 प्रतिषत गुरदासपुर बेधक की सूडियों का परजीवीकरण कोटेषिया फलेविप्स के द्वारा देखा गया। इस परजीवी द्वारा पलासी बेधक कीट का भी नियंत्रण होता है। प्रकृति में इनके द्वारा सूडियों का परजीवीकरण अप्रैल से जून तक कम तथा जुलाई के बाद आर्द्रता के बढ़ने के साथ परजीवीकरण बढ़ता जाता है। यहाॅ तक कि सितम्बर तथा अक्टूबर माह में इस परजीवी द्वारा 40-60 प्रतिषत तक सूडियाॅ प्रकृति में नश्ट हो जाती है।

घ- अंकुर बेधक कीट का ग्रेनुलोसिस वायरस

यह वायरस तमिलनाडु प्रान्त में अंकुर बेधक कीट की सूडी को 2..6 से 14.6 प्रतिषत तक प्रकृति में नश्ट कर देता है। इस वायरस का 106-108 इनक्लूषन वाडीज प्रति मिली0 का छिड़काव गन्ने की बुवाई के 30 दिन बाद से 15 दिन के अन्तराल पर चार बार करने से अंकुर बेधक का नियंत्रण देखा गया।

ड़- स्टरमियाप्सीस इनफरेन्स

यह परजीवी अंकुरबेधक व तनाबेधक कीट के सूॅड़ी का परजीवी अधिक तापक्रम पर जीवित रहता है तथा अंकुर बेधक कीट के नियंत्रित करने हेतु कीटनाषकों के प्रयोग के बावजूद भी इस परजीवी के सक्रियता पर बुरा असर नही पड़ता है। तमिलनाडू में इस परजीवी का प्रयोग अंकुर बेधक कीट के नियंत्रण हेतु किया जा रहा है। इस परजीवी के सम्बर्द्धन का कार्य गुलाबी बेधक कीट के सूड़ी पर प्रयोगषाला में करके अवमुक्त किया जा सकता है।

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