आगन्तुक संख्या
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2- चूसक कीटों का जैविक नियन्त्रण
पायरिला
क-शिशु व वयस्क परजीवी (इपीरीकेनिया मिलैनोल्यूका)
यह पायरिला के षिषु व वयस्क का प्राकृतिक परजीवी है, इसकी संख्या प्रकृति में मानसून के बाद अधिक पाई जाती है जिससे पायरिला का प्रकोप कम दिखाई देता है क्योंकि जैसे जैसे पायरिला की संख्या बढ़ती है तद्नुसार उनके परजीवी की संख्या में वृद्धि होती रहती है। पूर्वी उ0प्र0 के क्षेत्रों से इन परजीवियों के अण्ड-समूह एवं ककून को आन्ध्रप्रदेष, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेष, महाराश्ट्र, उडीसा, राजस्थान एवं पष्चिम बंगाल प्रान्त में अवमुक्त किया गया जिसके कारण इस समय उक्त परजीवियों की संख्या प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जिनके कारण पायरिला का प्रकोप होने के कुछ समय बाद ही परजीवी नियंत्रण कर लेता है। अगर पायरिला की संख्या 5-7 प्रति पत्ती की दर से प्रक्षेत्र में मौजूद हैं तो उनके प्रभावी नियन्त्रण हेतु इपीरीकेनिया मिलेनोल्यूका के 8,000 से 10,000 ककून और 8 से 10 लाख अण्डे/हे0 की दर से प्रयोग करने पर नियंत्रित किया जा सकता है। इपीरीकेनिया मिलेनोल्यूका के 2-3 अण्ड समूहों तथा 5-7 ककून पत्ती के निचले सतह पर स्टेपुल करने से इस परजीवी का विस्तार षीघ्र होता है।
ख- अण्ड-परजीवी
पायरिला के अण्ड परजीवी जैसे टेट्रास्टीकस पायरिली, काइलोन्यूरस पायरिली एवं ओनसिरटस पैपिलिओनस, प्रकृति में विद्यमान हैं जिनसे लगभग 80 प्रतिषत पायरिला की संख्या मानसून के बाद नियन्त्रित हो जाती है।
ग- परभक्षी

प्रकृति में बू्रमस सेचुरेलिस, काक्सीनेला सेप्टेमपक्टेटा एवं काक्सीनेला क्वाहीपक्टाटा नामक परभक्षी प्रकृति में मौजूद रहते हैं जो पायरिला कीट को नियन्त्रित करते है।

वर्ष 2005 में पायरिला कीट का प्रकोप पूर्वी एवं पष्चिमी उ0प्र0 के विभिन्न भागों में महामारी के रूप में देखा गया। पूर्वी उ0प्र0 के अन्तर्गत विभिन्न जिलों में बोयी गयी गन्ने की फसल (लगभग 207714 हे0 क्षेत्रफल) पर उक्त कीट के षिषु एवं वयस्क के परजीवी के घनत्व का सर्वेक्षण मार्च से सितम्बर, 2005 तक किया गया। मार्च माह में पायरिला कीट के षिषुओं का औसतन 22.10 प्रतिषत तथा वयस्क का 12..46 प्रतिषत इपिरिकेनिया मिलैनोल्यूका द्वारा परजीवीकरण पाया गया। अप्रैल माह में उक्त परजीवी का परजीवीकरण बढ़ता रहा तथा तत्पष्चात् जून माह में परजीवीकरण में गिरावट आ गयी जोकि 1.25 प्रतिषत वयस्क की संख्या के आधार पर हो पाया। उक्त परजीवीकरण में गिरावट मई एवं जून माह में तापक्रम के बढ़ने (29.32-30.22) तथा आर्द्रता के घटने (64.19-67.73 प्रतिषत) से रही। जून के अन्तिम सप्ताह में वर्षा के कारण षिषु एवं वयस्क का परजीवीकरण जुलाई माह में क्रमषः 35 प्रतिषत तथा 15 प्रतिषत पाया गया।

उक्त परजीवीकरण में वृद्धि, अधिक वर्षा (470.4 मि0मी0 21 दिन में) तथा वायुमण्डल में बढ़ती आर्द्रता व तापमान में गिरावट के कारण होती है। उक्त परजीवीकरण बढ़कर क्रमषः 60.50 प्रतिषत षिषु एवं 20.50 प्रतिषत वयस्क अगस्त में पाया गया। अन्त में सितम्बर माह में वयस्कों का परजीवीकरण 85-100 प्रतिषत तक देखा गया जिससे पायरिला कीट का नियंत्रण सितम्बर माह के मध्य तक संभव हो सका तथा प्रदेष में कीटनाषक का पर्णीय छिड़काव प्रतिबन्धित कर रु0 8,26,53,555.00 की बचत की गयी साथ ही वातावरण को प्रदूषण से मुक्त रखा गया।

घ- मेटाराइजियम एनी सोफिली

यह फफूदी पायरिला के षरीर पर प्रभाव डालता है जिससे प्रकृति में पायरिला नश्ट हो जाता है। मानसून के बाद उक्त फफूदी के स्पोर का छिड़काव करने पर कम तापक्रम व अधिक आर्द्रता के कारण यह पायरिला की संख्या 94 प्रतिषत तक कम कर देती है। उक्त फफूदी का घोल बनाकर पर्णीय छिड़काव करके पायरिला का नियंत्रण किया जाता है।

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