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शल्क कीट
1- एडीलेनसीरटस म्यूराई नामक परजीवी सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है।
2- काइलोकोरस नाइग्राईट्स व फेरोसिमनस हानीर्, इन्डीजीनस परभक्षी है। काइलोकोरस नाइग्राईट्स पूरे जीवन काल में लगभग 4500 स्केल कीट का भक्षण कर लेता है।
3- काइलोकोरस कैकटाई एवं स्टाई कोलोटिस मेडागासा प्रमुख विदेषी परभक्षी है जो आन्ध्र प्रदेष में शल्क कीट के नियंत्रण में अच्छे सिद्ध हुये हैं।
सफेद मक्खी
1- एजोटस डेलहेन्सिस तथा एमीटस एल्यूरोलोबी ये दोनों कृमि कोष के परजीवी हैं।
गुलाबी चिकटा या मिलीबग
1- एनागाइरस सैकरी कोला- यह शिशु एवं वयस्क का परजीवी है।
2- एनागाइरस स्वीजीई - यह दक्षिण भारत में पाया जाता है तथा अण्डे का परजीवी है।
3- क्रिप्टोलीमस मोनट्रोजेराई- यह भक्षी कीट है।
4- क्राइसोपा स्पी0- यह भक्षी कीट है।
जैविक कीट नियन्त्रण की उपयोगिता
1- जैविक विधि से कीटों का नियन्त्रण करने से वातावरण को प्रदूशित होने से बचाया जा सकता है।
2- कीटनाशकों की भांति परजीवी एवं परभक्षी का प्रयोग बार-बार नहीं करना पड़ता है क्योंकि प्रकृति के अनुकूल वातावरण में इनकी गुणात्मक वृद्धि स्वतः होती रहती है जिससे कीटों का नियन्त्रण प्रकृति में होता रहता है।
3- इनका प्रयोग कीटनाषकों की तुलना में आसान होता है। 4- इनके उत्पादन में लागत कम आती है जबकि कीटनाशक के ऊपर खर्च ज्यादा आता है।
5- गन्ने की फसल में कीटनाशकों का प्रयोग बहुत कठिन होता है जबकि परजीवी कार्ड लगाने में कोई परेशानी नहीं होती है।
इस तरह से गन्ने की फसल में लगने वाले विभिन्न कीटों को जैविक नियन्त्रण तकनीक को अपनाकर फसल सुरक्षा कर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
सारिणीः भारतवर्ष में गन्ने के विभिन्न नाशिकीटों का प्राकृतिक शत्रुओं द्वारा परजीवीकरण
क्र0 सं0 कीट का नाम परजीव/परभक्षी एवं ब्याधिजन परजीविता प्रतिशत
1 काइलोइन्फसकेटलस ट्राइकोग्रामा
टेलेनोमस
कोटेसिया फ्लेविप्स
स्टुरमिआप्सिस इन्फरेन्स
स्टेनोबे्रकान डी सी
अण्ड परभक्षी
4-5
15-22
4-14
6-5-22-2
5-7
6-8
2 काइलो आरिसीलियस कोटेशियाफ्लेविपस
कैम्पाइलोन्यूरस म्यूटेटर
एस0 इन्फरेन्स
10-4
60-78
20-50
3 का0सैक्रीपेगस इन्डिकस ट्राइकोग्रामा
टेलिनोमस
को0फलेविपस
रैकोनोटस
अण्डपरभक्षी
ग्रैनलोसिस वाइरस
2.7-8.5
15-90
15-90
4-14
25
9.4-22.2
4 सरपोफेगा इक्सरप्टेलिस ट्राइकोग्रामा
टेलिनोमस
को0फलेविपस
इलेसमस जेहेन्ट राई
रैकोनोटस सरपोफिगी
आइसोटीमा जावेन्सिस
4-5
5.8-5.5
4-14
5-15
7-12.2
5-40
 
जैविक नियंत्रण हेतु प्रयोगषाला, उपकरण एवम् परजीवी उत्पादन तकनीकी
भारत में लगभग 26 ट्राइकोग्रामा प्रजातियों की खोज की गयी है जिसमें से ट्राइकोग्रामा काइलोनिस, ट्राइकोग्रामा जापोनिकम एवं ट्राइकोग्रामा एकेमी विस्तृत रूप से फैली हैं। विदेशों में ट्राइकोग्रामेटिड्स के गुणन उत्पादन के लिये आटे की सूड़ी सिटोट्रोगा सेरीएल्ला को परपोषी कीट के रूप में प्रयोग करते हैं। यद्यपि भारत में धान के कीट कोरसायरा सिफैलोनिका को प्रयोगषाला में परपोषी कीट के रूप में प्रयोग किया जाता है। कोरसायरा सिफैलोनिका एवं ट्राइकोग्रामा के उत्पादन हेतु प्रयोगषाला एवं विभिन्न उपकरणों/सामग्रियों की आवष्यकता होती है जो निम्नानुसार हैः-
कोरसायरा सिफैलोनिका के उत्पादन हेतुः-
1- बिल्डिंग (चार कमरों वाली, जालीदार खिड़की एवं दरवाजे सहित)। खिड़कियाँ उत्तर व दक्षिण दिशा में होनी चाहिये।
2- कार्य करने के लिये मेजें।
3- लोहे की छिद्रवाली कोणीय रैक (2.4 मी0 ग 0.9 मी0 ग 0.45 मी0, 05 खानों वाली)।
4- कोरसायरा पालने वाला बॉक्स (43 ग 23 ग 13 से0मी0)।
5- अण्डा रोपण ड्रम।
6- ट्रे।
7- एल्मूनियम के कप।
8- कैंची एवं ब्रुष।
9- अल्ट्रावायलेट चैम्बर।
10- हॉट एअर ओवन एवम् ट्रे ड्रायर।
11- रेफ्रिजेरेटर।
12- वातानुकूलक।
13- वी0ओ0डी0 इन्क्यूवेटर।
14- सीलिंग फेन।
15- बिजली एवं पानी की सुचारु रूप से सुविधा।
16- कूलर।
17- जनरेटर (25 के0वी0ए0)।
18- एग्जास्ट फैन।
19- हवा खींचने वाला पम्प।
20- मापक सिलेण्डर।
21- काँच/प्लास्टिक ट्यूब।
22- रुई।
23- शहद।
24- फार्मलीन।
25- प्लास्टिक टब एवं ड्रम।
26- दला हुआ ज्वार/बाजरा/मक्का।
27- काला पापलीन कपड़ा।
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