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ट्राइकोग्रामा उत्पादन हेतु
1- कार्य करने हेतु मेजें।
2- फ्लूओरेसेन्ट ट्यूबलाइट (40 वाट)।
3- कैंची और ब्रुश।
4- कोरसायरा अण्डे (फ्रैश)।
5- चार्ट पेपर।
6- गोंद (एकेसिया)।
7- काँच ट्यूब।
शिपमेन्ट
1- चाकू/कैंचियाँ ।
2- कागज के गत्ते का डिब्बा।
3- थर्माकोल की शीट ।
4- बादामी कागज की शीट ।
5- गोंद।
6- प्रेषण के लिये चिप्पियाँ।
परजीवी उत्पादन
कोरसायरा सिफैलोनिका की उत्पादन तकनीकी
भारतवर्ष में गन्ना बेधकों की रोकथाम हेतु अण्ड परजीवी ट्राइकोग्रामा प्रजाति का प्रयोग किया जा रहा है। इस प्रजाति का उत्पादन प्रयोगशाला में कोरसायरा सिफैलोनिका नामक कीट के अण्डे से किया जाता है। कोरसायरा सिफैलोनिका भण्डारित अनाजों का हानिकारक कीट है। मक्का तथा ज्वार पर इसका उत्पादन अन्य अनाजों की अपेक्षा अच्छा पाया गया।
जीवनचक्र
वयस्क कीट मटमैले भूरे रंग का होता है। नर तथा मादा कीट लगभग बराबर मात्रा में पाये जाते हैं। वयस्क मादा एक दिन में लगभग 24-25 अण्डे की दर से चार दिन तक अण्डे देती है। अण्डे से सूंडी 24 घण्टे के बाद निकलना प्रारम्भ हो जाती है।सूंडी अवस्था 27 से 32 दिन की होती है। प्यूपा काल 10 से 13 दिन का होता है। प्रयोगषाला में इसका कल्चर पूरे वर्ष भर चलाया जाता है। प्रयोगशाला का तापमान 27 डिग्री से0ग्रेर्0 ं 02 डिग्री से0ग्रे0 तक रहना चाहिये।
उत्पादन विधि
लकड़ी के बने (43 ग 23 ग 13 से0मी0) जालीदार बॉक्स में 03 (तीन) कि0ग्रा0 मक्का/बाजरा की दलिया के साथ एक मि0ली0 कोरसायरा सेफैलोनिका का अण्डा मिला देते हैं। अण्डे से सूंडी निकलकर दानों (मक्का/बाजरा) को खाना प्रारम्भ कर देती हैं। 45 दिन के बाद कीट के वयस्क निकलना प्रारम्भ हो जाते हैं जो लगभग 75 दिन तक निकलते हैं। दानों को बॉक्स में रखने से पहले 100 डिग्री से0ग्रे0 तापक्रम पर 30 मिनट तक ओवन में उपचारित कर लिया जाता है ताकि दाने के अन्दर जो भी अन्य कीट उपस्थित हों नष्ट हो जायें। इसके अतिरिक्त निम्न सावधानियाँ व तरीके अपनाने चाहिये:-
1- प्रयोग में लाया गया मक्का/बाजरा कीटनाषक दवा से मुक्त होना चाहिये। इसके परीक्षण के लिये 100 ग्राम मक्का के दलिया में लगभग 20 प्रथम अथवा द्वितीय इन्सटार कोरसायरा लार्वा को दो से तीन दिन तक खाने के लिये डाल देना चाहिये। लार्वा को जिन्दा अथवा मरने के उपरान्त यह निष्कर्ष निकालना चाहिये कि प्रयोग में लाया गया दाना कल्चर हेतु उपयुक्त है या नहीं है।
2- प्रयोग में लाया जाने वाला दाना मिल में तीन या चार टुकड़ों में ही दला होना चाहिये।
3- मक्का दाना को 100 डिग्री से0ग्रे0 तापक्रम पर 30 मिनट तक उपचारित करने के बाद 0.1: फार्मलीन के घोल से उपचारित कर देना चाहिये ताकि उपचारित दाना में 15 से 16: तक की नमी आ जाये तथा इसे फफूँदी इत्यादि से बचाया जा सके। इसके उपरान्त मक्का दाना को हवा में सुखा लेना चाहिये।
4- वयस्क कीट 45 दिन बाद निकलना प्रारम्भ हो जाता है जो लगातार दो महीने तक निकलता रहता है। प्रतिदिन 10 से 75 वयस्क कीट प्रति बॉक्स की दर से निकलते हैं। सबसे अधिक वयस्क कीट 65 वें दिन के बीच में निकलते हैं।
5- प्रतिदिन वयस्क कीट को एकत्रित करके विषेष तरीके से अण्डे देने वाले बाॅक्स में डालना चाहिये।
6- अण्डे वाले बॉक्स से प्रतिदिन अण्डा एकत्रित करके बारीक लोहे की जालीदार छन्नी से साफ करना चाहिये और एक सफेद मोटे कागज पर अण्डे को ढाल बनाकर गिराना चाहिये जिससे अण्डे से लगी हुई गन्दगी एवं वयस्क कीट के टांग तथा स्केल अलग हो जांये।
7- प्रारम्भ में कोरसायरा कल्चर बनाने के बाद केज को 30 दिन तक बन्द करके रख देना चाहिए। इस प्रकार से 40 से 80 दिन तथा 120 दिन पर आवष्यकतानुसार केज बनाकर रखना चाहिए ताकि पूरे वर्ष कल्चर चलता रहे।
8- कल्चर रूम के अन्दर तथा बाहर सफाई का विषेष ध्यान रखना चाहिए। पुराने केजों को वयस्क निकालना बन्द होने के बाद तुरन्त साफ कर देना चाहिए तथा अवशेष को जला दें या लैब से दूर कहीं गड्ढे में डालकर दबा दें ताकि कोरसायरा कीट के लार्वा का परजीवी ब्रेकान कीट से कल्चर को बचाया जा सके।
9- यदि ब्रेकान कीट का प्रकोप कल्चर में दिखाई दे तो तत्काल किसी कीटनाषक का छिड़काव कमरे में तथा कमरे के बाहर कम सान्द्रता पर कर देना चाहिए।
10-ब्रेकान कीट को लाइटट्रैप द्वारा भी नष्ट किया जा सकता है।
ट्राइकोग्रामा का उत्पादन
1- कोरसायरा के अण्डों को यू0वी0 किरण (15 वाट लैम्प) से 45 मिनट तक उपचारित करते हैं जिससे कोरसायरा सिफैलोनिका के लार्वा न निकलने पायें।
2- साफ सुथरे अण्डों को 12 ग 2 से0मी0 के कार्ड पर गोंद लगाकर बिखेर देते हैं जिस पर अण्डे चिपक जायेंगे। कार्ड के दोनों तरफ 01 से0मी0 खाली जगह छोड़ देना चाहिये।
3- एक कार्ड पर लगभग 20,000 अण्डों का बिखराव हो जाता है।
4- ऐसे कार्ड जिन पर अण्डे चिपका दिये गये हों, को काँच के ऐसे बेलनाकार ट्यूब में रखते हैं जिसमें आसानी से रखे जा सके।
5- इस बेलनाकर ट्यूब में ट्राइकोग्रामा से कार्ड को परजीवीकृत करने के लिए 6:1 के अनुपात में कार्ड को लगाते हैं।
6- इस प्रकार परजीवीकरण हेतु कार्डों को ट्यूब में 24 से 48 घण्टे के लिये छोड़ दिया जाता है तथा ट्यूब को काले कपड़े एवं रुई से बने कार्क से बन्द कर देते हैं।
 
भण्डारण
1- परजीवीकृत कार्ड 3-4 दिन में काले पड़ जाते हैं जिसे भण्डारण के लिये फ्रिज में रख देते हैं।
2- फ्रिज में ट्राइकोकार्ड का भण्डारण 15 से 20 दिन तक बिना किसी सार्थक नुकसान के किया जा सकता है।
3- प्रयोगषाला का तापमान 27 डिग्री से0ग्रे0 से 02 डिग्री से0ग्रे0 तक रहना चाहिये।
प्रत्यारोपण
1- गन्ने की फसल में ट्राइकोकार्ड के प्रत्यारोपण हेतु फ्रिज में रखे हुए कार्ड को 24 घण्टे पहले फ्रिज से निकालकर कमरे के तापमान पर रख देते हैं।
2- प्रत्यारोपण की सुविधा हेतु कार्ड के छोटे-छोटे टुकड़े करके गन्ना पौधों की पत्तियों में प्रत्यारोपित कर देते हैं।
3- प्रत्यारोपण सायं काल के समय करना चाहिए।
4- 50,000 ट्राइकोग्रामा के अण्डे/प्रौढ़ 15 दिन के अन्तराल पर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रत्यारोपित करना चाहिए।
5- प्रत्यारोपण के एक सप्ताह पहले तथा एक सप्ताह बाद तक किसी भी कीटनाषक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
ट्राइकोग्रामा परजीवी के प्रयोग से निम्न लाभ होता हैः-
अ- ट्राइकोग्रामा परजीवी के प्रयोग से वातावरण में किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता है जबकि नाशिकीटों के प्रयोग से वातावरण प्रदूषित होता है।
ब- ट्राइको कार्ड कीटनाषकों की अपेक्षा सस्ता एवं इसका प्रत्यारोपण आसान है।
स- ट्राइको कार्ड का प्रयोग गन्ने के अतिरिक्त अन्य फसलों में भी बेधकों के विरुद्ध कर सकते हैं जैसे-धान का तना बेधक, टमाटर फल छेदक, कपास, बैंगन, भिण्डी, नीबू एवं सेव की सूंडी ।
द- बार-बार कीटनाषकों का प्रयोग करने से नाषिकीटों में प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न हो जाती है।
य- ट्राइकोग्रामा अण्डपरजीवी होने के कारण क्षति से पूर्व ही कीट को नियंत्रित कर लेता है।
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